उत्तराखंड का लगभग86.07% भू-भाग पर्वतीयक्षेत्र वाला है, व लगभग13.93% भू-भाग मैदानी भाग है ।
उत्तराखंड प्राकृतिक व धरातलीय विषमता वाला प्रदेश है, उत्तराखंड में कहीं– कहीं हिमाच्छादितपर्वत श्रेणियां व ऊँची पर्वतीय ढलान वाली चोटियां है, तो कहीं नदी घाटी क्षेत्र है, तो कहीं-कहीं पर भाबर के उबड़-खाबड क्षेत्र तो व तराई के उपजाऊ मैदान है ।
ऊंचाई, ताप एवं वर्षा की मात्रा में भिन्नता व उच्चावच विषमता के आधार पर उत्तराखंड को निम्न भौगोलिक प्रदेशों में बांटा गया जो इस प्रकार है ।
1 ट्रांस हिमालय
2 महान हिमालय
3 लघु मध्य हिमालय
4 शिवालिक
5दून और द्वार
6 भाबर
7 तराई
8 गंगा का मैदानी भाग
ट्रांस हिमालय (Trans or Tibet Himlayas) –
* यह महान हिमालय के उत्तर में उसके समांतर तक फैला हुआ है, इसे तिब्बत हिमालय कहा जाता है,
इसका अधिकांश भाग तिब्बत में शामिल है ।
* ट्रांस हिमालय में जास्कर श्रेणी है उस जास्कर श्रेणी में उत्तराखंड का क्षेत्र सम्मिलित है, वह भौगोलिक दृष्टि से ट्रांस हिमालय का वृष्टि छाया प्रदेश के अंतर्गत आता है, जो शुष्क वर्षा विहीन क्षेत्र है ।
* जास्कर श्रेणी चीन तिब्बत से सीमा बनाती है , यह क्षेत्र20 से 30 किमी० चौड़ा व इसकी ऊंचाई 3000 से 3500 मीटर है, इस क्षेत्र में उत्तराखंड के कुछ प्रमुख दर्रे हैं ।
* लिपुलेख, निति, माणा किंगरी-बिंगरी इस क्षेत्र के प्रमुख दर्रे है ।
* ट्रांस हिमालय वृहद हिमालय से श्चरजोन या हिन्ज लाईनद्वारा अलग होता है ।
वृहद हिमालय अथवा आंतरिक हिमालय
(Great Himalayas or inner Himalayas )
* इससे महान हिमालय मुख्य हिमालय व प्राचीन ग्रंथों में हिमाद्री के नाम से जाना जाता है ।
* उत्तराखंड में इसका क्षेत्रीय जिलों में विस्तार चmoली, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, टिहरी, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर में है ।
* यह ट्रांस हिमालय व लघु मध्य हिमालय के मध्य स्थित है, इस क्षेत्र में उत्तराखंड की ऊंची व दुर्गम चोटिया स्थित है, जो वर्ष भर हिमाच्छादित रहती हैं ।
* उत्तराखंड की सबसे ऊंची चोटी नंदा देवी जो गढ़वाल हिमालय की सबसे ऊंची चोटी है।
* कुमाऊं हिमालय की सबसे ऊंची चोटी पंचाचुली पिथौरागढ़ में स्थित है।
* राज्य की अन्य ऊंची चोटिया – कामेद, नंदा देवी पूर्वी, चौखंबा, त्रिशूल आदि ।
* हिमाच्छादित चोटिया विद्यमान होने इस क्षेत्र में ग्लेशियर अवस्थित है –
गंगोत्री, मिलम, पिंडर,यमुनोत्री, खतलिंग चोराबाड़ी आदि ग्लेशियर है ।
* ग्लेशियर से उदगामित होने वाली नदियां इस क्षेत्र में प्रवाहित होती है जो इस प्रकार हैं।
* गंगोत्री ग्लेशियर– भागीरथी
* यमुनोत्री ग्लेशियर– यमुना नदी
* खतलिंग ग्लेशियर– भिलंगना नदी
* पिंडारी ग्लेशियर– पिंडर नदी
* वनों की दृष्टि से यहां पर शीतोष्ण सदाबहार नुकीली पत्तियां व मुलायम लकड़ी वाले वन पाए जाते हैं जिनमें चीड़, देवदार, ब्लू, पाइन, अल्पाइन, प्रमुख है ।
* इस पर्वतीय क्षेत्र में पर्वती ढलान में शीतोष्ण घास के मैदान पाए जाते जिन्हें उत्तराखंड में बुग्याल या पंयार कहा जाता है
* राज्य का सबसे बड़ा बुग्याल बेदनी बुग्याल चमोली में स्थित है ।
इसके अलावा हर की दून, चोपता, देव दामिनी कुश कल्याण, क्यारी मदमहेश्वर आदि बुग्याल है ।
* विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी इसी क्षेत्र में चमोली जनपद में स्थित है, जो राज्य का सबसे छोटा नेशनल पार्क है । जिसकी खोज का श्रेय फ्रैंकस्मिथ को जाता है ।
* इस क्षेत्र में उत्तराखंड की ऋतु प्रवास करने वाली जनजाति भोटिया जनजाति निवास करती जिनका व्यवसाय पशुपालन, जड़ी बूटी ,कीडा जड़ी व्यापार, हस्तशिल्प खेती करना है ।
* वृहद हिमालय लुघ हिमालय से मेन सेंट्रल थ्रस्ट दवारा अलग हुआ है ।
लघु अथवा मध्य हिमालय
(The Lesser or the Middle Himalayas )
* यह महान हिमालय वशिवालिक के मध्य स्थित है ।
* महान हिमालय की अपेक्षा इस क्षेत्र में कम ऊंचाई वाली चोटियां पाई जाती हैं जो शीतकाल में वर्षा पड़ने पर हिमाच्छादित होती है तब ऊँचे क्षेत्रों में तापमान शून्य से नीचे गिर जाता है ।
* मुक्तेश्वर उत्तराखंड का सबसे ठंडा स्थल है ।
* वृहद हिमालय से प्रवाहित होने वाली नदियों ने इस क्षेत्र की पर्वत श्रेणी को कांट- छाट दिया है जिससे यहाँ पठार जैसी संरचना नदी घाटियों का विकास हुआ है ।
* दुधातोलीजिसे उत्तराखंड का पामीर का पठार कहते हैं, इसी क्षेत्र में स्थित है जहां से कईनदियां का उद्गम होता है।
* इस क्षेत्र में सरयू, पूर्वी नायर, पश्चिमी नायर, आटागाड़ा, बूनो, पश्चिमी रामगंगा, कोसी,खोहे,मालिनी आदि है ।
* खनिज की दृष्टि से यह क्षेत्र महत्वपूर्ण है, यहां पर ग्रेफाइट, जिप्सम, तांबा, सेल, क्वटरईज, चूना पत्थर, ग्रेनाइट आदि खनिज पाए जाते हैं ।
* वन संसाधन आर्थिक क्रियाकलाप मानव निवास की दृष्टि से यह क्षेत्र सबसे अधिक महत्वपूर्ण है ।
इस क्षेत्र में पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीदार खेती की जाती है व शीतोष्ण फल उगाये जाते है ।
*, बागवानी खेती की जाती है ।
* लघु हिमालय शिवालिक से मैन बाउंड्री थ्रस्ट द्वारा अलग होता है ।
शिवालिक श्रेणी– (The shivalik )
* प्राचीनभूगोल वक्ताओं ने इसे मैनाक पर्वत नाम दिया है ।
* यह हिमालय की सबसे नवीन श्रेणी है- यह हिमालय की अन्य श्रेणियों की अपेक्षा छोटी है अतः इसे उप हिमालय व हिमालय का पाद कहते हैं ।
* शिवालिक का निर्माण बालू कंकण व सपिंडात्मक शैल से हुआ हैं महान हिमालय से निकलने वाली नदियों ने जिन्हें जमा किया है ।
* नैनीताल, हरिद्वार, देहरादून, टिहरी, पौड़ी,चंपावत, अल्मोड़ा, जिलों के कुछ भाग शिवालिक श्रेणी के अंतर्गत आते हैं, जो पर्यटन व आर्थिक दृष्टि से यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है ।
* देहरादून शिवालिक क्षेत्र का सबसे बड़ा नगर है जो राज्य की राजधानी भी है ।
* शिवालिक क्षेत्र में प्रमुख वन चीड़, बांस,शाल, शीशम, है ।
* लघु तथा शिवालिक के बीच कहीं-कहीं घाटी पाई जाती है, जिन्हें पश्चिम में दून तथा पूर्व में द्वार कहा जाता है। उत्तराखंड में प्रसिद्ध सबसे बड़ी दून घाटी देहरा घाटी देहरादून में है ।
भाबर क्षेत्र –
* भाबर क्षेत्र का निर्माण पर्वतीय क्षेत्र में प्रवाहित होने वाली नदियों द्वारा लाए गए बड़े-बड़े पत्थर कंकड़ के निक्षेपण से हुआ है।
* यहां नदियों का जल भूमिगत हो जाता है , प्रायः क्षेत्र कृषि की दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं है।
* यहां पर बागवानी फसलें उगाई जाती है साग, सब्जी, फल आदि ।
तराई क्षेत्र –
* यह अपेक्षाकृत निम्न भूमि है जिसका निर्माण छोटे महीन पत्थर कंकड़ वाले अवसाद से हुआ है।
* यहां पर भाबर में प्रवाहित होने वाली नदियों का जल दिखाई देने लगता है तथा यह क्षेत्र दलदली क्षेत्र है जो पूर्व में मच्छर बैल्ट के नाम से जाना जाता था यहाँ थारू जनजाति के लोगों ने अपने अस्तित्व को बनाये रखा अतः थारू जनजाति को मानव वैज्ञानिक ने मलेरिया प्रूव मानव कहा है ।
* इस क्षेत्र में पाताल तोड़ कुए पाए जाते हैं 10 फीट खोदने मे पानी प्राप्त हो जाता है , वर्तमान में यह क्षेत्र उत्तराखंड का सबसे बड़ा कृषि प्रदेश के रूप मे बनकर उभरा है उत्तराखंड उधमसिंग नगर का अधिकांश भाग इसी के अंतर्गत आता है I
* यहां पर सभी प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं। जिनमें गेहूं, धान, गन्ना, सरसों, मटर, रागी आदि उगाई जाती है I
आगे के आने वाले अध्याय में हम उत्तराखंड के दर्रे, उत्तराखंड की ऊँची चोटी, उत्तराखंड की झीलो, उत्तराखंड के बुग्याल का गहनता से चर्चा करेंगे ।
गंगा के मैदान प्लेन
इस के अंतर्गत हरिद्वार का एक बड़ा भू -भाग आता है, इस क्षेत्र का निर्माण गंगा व उसकी सहयक नदियों द्वारा निक्षेपित अवसाद गाद से हुआ है, यहाँ पर जलोढ़ की काँप का विस्तार है जलोढ़ भारत की सर्वाधिक अपजाऊ मृदा इसके दो प्रकार हैं बंगार और खादर
बांगर पुरानी जलोढ़ और खादर नै जलोढ़ को कहते हैं
2 टिप्पणियाँ
Pintoo arya · नवम्बर 28, 2020 पर 3:21 पूर्वाह्न
Maza as gayA sir ji, bahut khoob
Guruji · नवम्बर 28, 2020 पर 8:13 पूर्वाह्न
thanks