उत्तराखंड के प्रमुख लोक वाद्य यंत्र: परंपरा, प्रकार एवं सांस्कृतिक महत्व
उत्तराखंड को देवभूमि के साथ-साथ अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, लोकगीत, लोकनृत्य और लोक परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। यहां के पर्वतीय जीवन, धार्मिक आस्थाओं, सामाजिक परंपराओं और प्राकृतिक परिवेश की सुंदर अभिव्यक्ति लोकसंगीत में दिखाई देती है। उत्तराखंड के लोकसंगीत की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में यहां के पारंपरिक लोक वाद्य यंत्र शामिल हैं।
उत्तराखंड के लोक वाद्य केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि ये यहां की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन-शैली का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। विवाह, जन्म, नामकरण, धार्मिक अनुष्ठान, जागर, मेले, त्योहार, देवयात्रा और अन्य मांगलिक अवसरों पर इनका प्रयोग लंबे समय से होता आया है।
उत्तराखंड में लोक वाद्यों की परंपरा
लोकगीत और लोकनृत्य की परंपरा उत्तराखंड में प्राचीन समय से चली आ रही है। लोकसंगीत और लोकनृत्य को लोक वाद्यों से अलग करके देखना कठिन है। उपलब्ध सामग्री में उत्तराखंड में लगभग 36 प्रकार के प्रमुख लोक वाद्यों के प्रचलन का उल्लेख मिलता है। इन्हें मुख्य रूप से घन वाद्य, अवनद्ध या चर्म वाद्य, सुषिर वाद्य तथा तंत या तार वाद्य जैसी श्रेणियों में रखा गया है।
इन वाद्यों की ध्वनि में उत्तराखंड के पर्वतीय परिवेश और लोकजीवन की विशेष झलक दिखाई देती है। हिमालय, पहाड़, नदियां, जंगल और ग्रामीण जीवन ने यहां के लोकसंगीत को एक विशिष्ट पहचान प्रदान की है।
उत्तराखंड के लोक वाद्यों का वर्गीकरण
1. घन वाद्य
जिन वाद्यों में धातु या ठोस पदार्थ को आघात देकर ध्वनि उत्पन्न की जाती है, उन्हें घन वाद्य की श्रेणी में रखा जाता है।
प्रमुख घन वाद्यों में—
- बिणाई/वीणाई
- कांसे की थाली
- मंजीरा
- घाना या घानी
- घुंघरू
- झांझ
- घंट
- करताल
- खंजरी
- चिमटा
आदि का उल्लेख मिलता है।
बिणाई
बिणाई उत्तराखंड का एक पारंपरिक और अब लगभग विलुप्तप्राय वाद्य माना गया है। इसे विभिन्न क्षेत्रों में मोरचंग, मोछंग, मोरछंग और Jaw Harp जैसे नामों से भी जाना जाता है। यह आकार में छोटा वाद्य है और मुख्यतः ताल एवं ध्वनि की विशिष्ट लय उत्पन्न करने के लिए प्रयोग किया जाता रहा है।
2. अवनद्ध या चर्म वाद्य
इन वाद्यों में चमड़े या पशु-चर्म से बनी झिल्ली का प्रयोग किया जाता है। उत्तराखंड के लोकसंगीत में इस श्रेणी के वाद्यों का विशेष महत्व है।
प्रमुख चर्म वाद्य हैं—
- ढोल
- दमाऊं
- हुड़का
- डौंर
- ढोलकी
- नगाड़ा
- डफली
- डमरू आदि।
ढोल
ढोल उत्तराखंड के सबसे महत्वपूर्ण और लोकप्रिय लोक वाद्यों में से एक है। इसका प्रयोग मांगलिक कार्यों, विवाह समारोहों, धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा यात्राओं, लोक उत्सवों, जागर और सामूहिक नृत्यों में किया जाता है।
कुमाऊं क्षेत्र में ढोल को धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों से विशेष रूप से जोड़ा गया है। लोकमान्यताओं में इसकी ध्वनि को विजय और देव आह्वान से भी संबंधित माना गया है।
ढोल को बजाने वाले कलाकार को सामान्यतः ढोली कहा जाता है। स्रोत सामग्री में ढोल-दमाऊं को उत्तराखंड के लोकप्रिय वाद्य यंत्रों में बताया गया है।
नोट- 2015 में ढोल उत्तराखंड राज्य का वाद्य यंत्र घोषित किया गया है I
दमाऊं
दमाऊं ढोल का प्रमुख सहायक वाद्य है। इसकी ध्वनि गहरी और प्रभावशाली होती है। इसका प्रयोग विशेष रूप से धार्मिक कार्यक्रमों, जागर तथा अन्य पारंपरिक आयोजनों में ढोल के साथ किया जाता है।
कुमाऊं संबंधी स्रोत सामग्री के अनुसार दमाऊं आकार में ढोल से छोटा होता है और ढोल के साथ बजाए जाने पर लोकसंगीत की लय को प्रभावशाली बनाता है।
हुड़का
हुड़का उत्तराखंड का अत्यंत महत्वपूर्ण पारंपरिक वाद्य है। इसका प्रयोग विशेष रूप से जागर और लोकगीतों में किया जाता है। यह हल्का और आसानी से बजाया जाने वाला वाद्य है।
लोकमान्यताओं में इसे भगवान शिव के डमरू से भी जोड़ा जाता है। जागर परंपरा में हुड़के की थाप का विशेष महत्व माना गया है।
डौंर
डौंर को उत्तराखंड की लोक परंपरा में शिव से संबंधित वाद्य के रूप में भी जाना जाता है। इसका प्रयोग विशेष रूप से जागर और धार्मिक-सांस्कृतिक अनुष्ठानों में किया जाता है।
स्रोत सामग्री में डौंर को डमरू के समान आकार वाला वाद्य बताया गया है तथा देवताओं से संबंधित जागर परंपरा में इसके प्रयोग का उल्लेख मिलता है।
ढोलकी
ढोलकी का प्रयोग विशेष रूप से कुछ लोक समुदायों और त्योहारों के अवसर पर किया जाता है। उपलब्ध सामग्री के अनुसार इसे सामान्यतः लकड़ी से बनाया जाता है और इसकी पुड़ियों के लिए पशु-चर्म का प्रयोग किया जाता है।
नगाड़ा
नगाड़ा एक प्रभावशाली पारंपरिक वाद्य है। इसका प्रयोग प्राचीन समय में युद्ध जैसे अवसरों पर किया जाता था। इसके अलावा मंदिरों और विभिन्न लोकनृत्य परंपराओं में भी नगाड़े का प्रयोग मिलता है।
3. सुषिर वाद्य
जिन वाद्यों में हवा फूंकने से ध्वनि उत्पन्न होती है, उन्हें सुषिर वाद्य कहा जाता है।
उत्तराखंड में प्रमुख सुषिर वाद्यों में—
- बांसुरी
- जौंया मुरुली
- भौकर या भंकोरा
- तुरही
- रणसिंघा
- नागफणी
- शंख
- मशकबीन
आदि का उल्लेख मिलता है।
बांसुरी
बांसुरी उत्तराखंड के लोकसंगीत का मधुर और लोकप्रिय वाद्य है। इसका प्रयोग विशेष रूप से लोकगीतों में किया जाता है। पर्वतीय परिवेश में चरवाहों द्वारा भी बांसुरी बजाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। लोकगीतों में बांसुरी की धुन गीतों को भावपूर्ण बनाने में सहायक होती है।
रणसिंघा
रणसिंघा को पारंपरिक रूप से युद्ध से जुड़े वाद्य के रूप में देखा जाता है। उपलब्ध सामग्री के अनुसार प्राचीन समय में युद्ध के अवसरों पर इसकी ध्वनि सूचना या सावधान रहने का संकेत देती थी। वर्तमान में इसका प्रयोग धार्मिक और सांस्कृतिक अवसरों पर भी किया जाता है।
भौकर या भंकोरा
भौकर/भंकोरा लंबे आकार का प्राचीन सुषिर वाद्य है। स्रोत सामग्री में इसकी लंबाई लगभग 3 से 6 मीटर तक बताई गई है। इसे फूंक मारकर बजाया जाता है और धार्मिक अनुष्ठानों में इसके प्रयोग का उल्लेख मिलता है।
मशकबीन
मशकबीन उत्तराखंड के लोकसंगीत में प्रयोग किया जाने वाला सुषिर वाद्य है। इसे विशेष रूप से विवाह, धार्मिक उत्सवों और जुलूसों में बजाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। स्रोत सामग्री में इसे अंग्रेजी में Bagpipe से भी जोड़ा गया है।
शंख
शंख का उत्तराखंड की धार्मिक परंपराओं में विशेष महत्व है। धार्मिक कार्यक्रमों का आरंभ और समापन शंखध्वनि के साथ किए जाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। शंख को धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण से जोड़कर देखा जाता है।
4. तंत या तार वाद्य
जिन वाद्यों में तारों की सहायता से ध्वनि उत्पन्न की जाती है, उन्हें तार या तंत वाद्य कहा जाता है।
प्रमुख तार वाद्यों में—
- सारंगी
- एकतारा
- दोतारा
- गोपीचंद्र का एकतारा या गोपी यंत्र
का उल्लेख मिलता है।
सारंगी
सारंगी उत्तराखंड के लोकसंगीत का महत्वपूर्ण तार वाद्य है। उपलब्ध सामग्री में इसे लोक गायकों तथा विशेष रूप से बद्दी/मिरासी परंपरा से जुड़े गायकों का प्रिय वाद्य बताया गया है। इसकी धुन लोकगीतों में भावनात्मक गहराई पैदा करती है।
एकतारा
एकतारा एक सरल लेकिन प्रभावशाली तार वाद्य है। उपलब्ध स्रोत में इसका संबंध नाथ पंथ के योगियों से बताया गया है।
लोक वाद्य और धार्मिक परंपराएं
उत्तराखंड के लोक वाद्यों का धार्मिक जीवन से गहरा संबंध है। जागर परंपरा में हुड़का, डौंर और ढोल जैसे वाद्यों का प्रयोग किया जाता है। इनकी थाप और ध्वनि के माध्यम से धार्मिक अनुष्ठानों को विशेष स्वरूप मिलता है।
घंटियां, शंख, झांझ तथा अन्य वाद्य मंदिरों और पूजा-अर्चना में वातावरण को भक्तिमय बनाने का कार्य करते हैं। कई स्थानों पर देवताओं की पूजा, देवयात्रा तथा अन्य धार्मिक अवसरों पर पारंपरिक वाद्यों के प्रयोग की परंपरा आज भी दिखाई देती है।
लोकगीत और लोकगायन परंपरा
उत्तराखंड की लोकसंगीत परंपरा केवल वाद्यों तक सीमित नहीं है। यहां लोकगीतों की भी समृद्ध परंपरा रही है। कुमाऊं क्षेत्र में शकुनाखर, न्यौली, चांचरी, झोड़ा, छपेली, फाग और बौर जैसी गायन शैलियों का उल्लेख मिलता है।
शकुनाखर गीत
शकुनाखर गीत मांगलिक अवसरों पर गाए जाने वाले गीत हैं। जन्म, छठी, नामकरण, यज्ञोपवीत और विवाह जैसे अवसरों पर इनके गायन की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
न्यौली
न्यौली कुमाऊं की एक विशिष्ट गायन शैली है। स्रोत सामग्री में इसे एक पक्षी से जुड़ी भावनात्मक कल्पना के आधार पर विकसित गायन परंपरा के रूप में बताया गया है।
चांचरी
चांचरी कुमाऊंनी लोकगीतों की एक विशिष्ट शैली है। इसके अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नाम भी मिलते हैं। उपलब्ध सामग्री के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में इसे झोड़ा, भैनी-भैनी या खेल जैसे नामों से भी संबोधित किया जाता है।
झोड़ा
झोड़ा का मूल संबंध ‘जोड़ा’ शब्द से बताया गया है। इसमें लोग समूह बनाकर एक-दूसरे का हाथ पकड़ते हुए सामूहिक रूप से गीत गाते और नृत्य करते हैं। इस कारण झोड़ा उत्तराखंड की सामूहिक लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
छपेली
छपेली का संबंध तीव्र गति से गाए जाने वाले नृत्य गीतों से बताया गया है। विवाह, उत्सव और मेलों में इसका आयोजन किया जाता है। इसमें मुख्य गायक और नर्तक समूह के माध्यम से गीत एवं नृत्य प्रस्तुत किया जाता है।
बौर
बौर गायकों के बीच प्रश्न-उत्तर या वाद-विवाद जैसी शैली में प्रस्तुत किया जाने वाला गीतात्मक रूप है। इसमें एक पक्ष दूसरे पक्ष को प्रश्नों के माध्यम से चुनौती देता है और उत्तर न दे पाने वाला पक्ष पराजित माना जाता है।
फाग
फाग को विभिन्न संस्कारों और मांगलिक अवसरों पर गाए जाने वाले गीतों से जोड़ा गया है। स्रोत सामग्री में पुत्र जन्म, षष्ठी, नामकरण, व्रतबंध और विवाह जैसे अवसरों पर इनके गायन का उल्लेख है।
उत्तराखंड की संस्कृति के संरक्षण में लोक वाद्यों का योगदान
उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्र केवल संगीत उत्पन्न करने वाले साधन नहीं हैं, बल्कि वे पहाड़ की सामाजिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान के वाहक हैं।
इन वाद्यों के माध्यम से—
- धार्मिक परंपराएं आगे बढ़ती हैं।
- लोकगीत और लोकनृत्य जीवित रहते हैं।
- विवाह एवं मांगलिक संस्कारों की परंपराएं कायम रहती हैं।
- जागर जैसी लोक धार्मिक परंपराओं को स्वर मिलता है।
- मेले और त्योहारों में सामुदायिक सहभागिता बढ़ती है।
- नई पीढ़ी को अपनी लोक संस्कृति से जोड़ने में सहायता मिलती है।
स्रोत सामग्री में यह भी उल्लेख है कि आधुनिकता और संरक्षण के अभाव के कारण कई पारंपरिक वाद्य विलुप्ति की ओर बढ़ रहे हैं। सारंगी, जौंया मुरुली, बिणाई, भौंकर, नागफणी और एकतारा जैसे कुछ वाद्यों को इस संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखित किया गया है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड के लोक वाद्य यंत्र यहां की लोकसंस्कृति, धार्मिक आस्था, सामाजिक जीवन और ऐतिहासिक परंपराओं का जीवंत हिस्सा हैं। ढोल-दमाऊं की थाप हो, जागर में हुड़के की ध्वनि हो, मंदिर में शंख और घंटियों की गूंज हो या लोकगीतों में बांसुरी और सारंगी के मधुर स्वर—हर वाद्य उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को अलग-अलग रूप में प्रस्तुत करता है।
आज आवश्यकता है कि इन पारंपरिक वाद्यों और लोकगायन शैलियों का दस्तावेजीकरण किया जाए, युवा पीढ़ी को इनके बारे में जानकारी दी जाए और पारंपरिक कलाकारों को उचित मंच मिले। क्योंकि लोक वाद्यों का संरक्षण केवल संगीत का संरक्षण नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की लोकस्मृति और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी है। स्रोत सामग्री भी लोक वाद्यों और लोकगायन को कुमाऊंनी जनमानस की एकता तथा सांस्कृतिक संरक्षण से जोड़ती है।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
प्रश्न 1. उत्तराखंड के लोक वाद्यों को मुख्य रूप से किन श्रेणियों में बांटा गया है?
उत्तर: घन वाद्य, अवनद्ध/चर्म वाद्य, सुषिर वाद्य तथा तंत/तार वाद्य।
प्रश्न 2. जागर में प्रमुख रूप से किन वाद्यों का प्रयोग मिलता है?
उत्तर: हुड़का/हुड़की, डौंर, ढोल आदि।
प्रश्न 3. ढोल का प्रमुख सहायक वाद्य कौन-सा है?
उत्तर: दमाऊं।
प्रश्न 4. बिणाई को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर: मोरचंग, मोछंग, मोरछंग आदि।
प्रश्न 5. उत्तराखंड के लोक वाद्यों की कौन-सी श्रेणी हवा के प्रयोग से ध्वनि उत्पन्न करती है?
उत्तर: सुषिर वाद्य।
प्रश्न 6. उत्तराखंड में लगभग कितने प्रमुख लोक वाद्यों के प्रचलन का उल्लेख स्रोत सामग्री में मिलता है?
उत्तर: लगभग 36।
प्रश्न 7. शंख का प्रमुख उपयोग किस क्षेत्र में होता है?
उत्तर: धार्मिक एवं पूजा-अनुष्ठानों में।
प्रश्न 8. झोड़ा किस प्रकार की लोक परंपरा है?
उत्तर: सामूहिक लोकगीत एवं नृत्य की परंपरा।
प्रश्न 9. उत्तराखंड के किन लोक वाद्यों के विलुप्ति की ओर बढ़ने का उल्लेख है?
उत्तर: बिणाई, सारंगी, जौंया मुरुली, भौंकर, नागफणी और एकतारा आदि।
प्रश्न 10. उत्तराखंड के लोक वाद्य किसका प्रतीक माने जा सकते हैं?
उत्तर: उत्तराखंड की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत एवं सामुदायिक एकता का।
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