Bagnath Temple – Bageshwar

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Bagnath Temple - Bageshwar

बागनाथ मंदिर (बागेश्वर): एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर

बागेश्वर का बागनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक धार्मिक स्थल है, जो गोमती और सरयू नदी के संगम पर स्थित है। इसे उत्तर भारत के वाराणसी के समान धार्मिक महत्व प्राप्त है। यहां की पवित्र सरयू नदी, जिसे ‘कुमाऊं की गंगा’ भी कहा जाता है, के किनारे स्थित यह मंदिर भक्तों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। बागेश्वर का यह स्थान प्राचीन समय से शिव की तपोभूमि माना जाता है, और यहां शिवजी के व्याघ्र रूप में विराजने की मान्यता भी है। इसलिए इसे “व्याघ्रेश्वर” भी कहा जाता है। प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक ई. एटकिंसन ने इसे “गोल्डन वैली” कहा था।

बागेश्वर का धार्मिक महत्व

यह क्षेत्र भीलेश्वर और नीलेश्वर पर्वतों के बीच बसा हुआ है, जहां दो प्रमुख कुंड – सूरज कुंड और अग्नि कुंड स्थित हैं। धार्मिक दृष्टि से यह स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि शिव-पार्वती के वियोग के बाद मार्कंडेय मुनि ने यहां तपस्या की और शिव की बागनाथ नाम से प्रतिष्ठा की। कार्तिकेयपुर के राजाओं ने इस मंदिर के रखरखाव और पूजन के लिए भूमि का दान किया। बागनाथ मंदिर में कार्तिकेयपुर के राजा भूदेव का एक प्रस्तर अभिलेख भी पाया गया है।

बागनाथ मंदिर र्निर्माण

इस मंदिर का निर्माण कत्यूरी द्वारा किया गया फिर मध्य काल में बागनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कुमाऊं के चंद वंश के शासक लक्ष्मी चंद द्वारा किया गया था। इस मंदिर और आसपास के क्षेत्रों में स्थानीय पत्थरों का प्रयोग किया गया है। यहां स्थित काल भैरव मंदिर को क्षेत्रपाल देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है।

उत्तरायणी मेला: संस्कृति और व्यापार का संगम

बागेश्वर में हर साल मकर संक्रांति के अवसर पर उत्तरायणी मेला लगता है। इस मेले के दौरान सरयू नदी में स्नान करने के लिए देश भर से श्रद्धालु आते हैं। इस अवसर पर बागनाथ देवता की विशेष पूजा की जाती है और कुमाऊं की अनूठी सांस्कृतिक झलक देखने को मिलती है। स्वतंत्रता से पहले यह स्थान एक औद्योगिक मेले का भी प्रमुख केंद्र था, जिसमें सीमांत वास भोटिया जनजाति के लोग तिब्बत से ऊन लाकर व्यापार करते थे। उस समय यह भारत-तिब्बत व्यापार का मुख्य केंद्र था।

राष्ट्रीय और स्वराज आंदोलन में योगदान

बागेश्वर केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्रता संग्राम में भी एक प्रमुख केंद्र रहा है। यहां 1921 में ‘कुली उतार प्रथा’ के खिलाफ सत्याग्रह किया गया था। इस सत्याग्रह में 40,000 लोगों ने भाग लिया और प्रतिज्ञा की कि वे जबरन कुली नहीं बनेंगे और न ही किसी का बोझ उठाएंगे। तीन दिन के सत्याग्रह के बाद यह कुप्रथा समाप्त हो गई थी।

बागेश्वर का बागनाथ मंदिर अपने धार्मिक, सांस्कृतिक, और ऐतिहासिक महत्व के कारण न केवल कुमाऊं क्षेत्र में, बल्कि पूरे उत्तर भारत में एक प्रतिष्ठित स्थान है।

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