शहीद श्रीदेव सुमन: टिहरी रियासत के स्वतंत्रता सेनानी और जननायक
परिचय
उत्तराखंड के इतिहास में शहीद श्रीदेव सुमन का नाम अदम्य साहस, त्याग और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए किए गए संघर्ष का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने टिहरी रियासत की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध अहिंसात्मक आंदोलन चलाया और अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। 84 दिनों के ऐतिहासिक आमरण अनशन के बाद 25 जुलाई 1944 को उन्होंने प्राण त्याग दिए और उत्तराखंड के अमर शहीदों में शामिल हो गए।
जन्म और परिवार
श्रीदेव सुमन का जन्म 25 मई 1916 को तत्कालीन टिहरी गढ़वाल रियासत के जौल गाँव (बमुंड पट्टी) में हुआ। उनका वास्तविक नाम श्रीदत्त बडोनी था।
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पिता: वैद्य हरिराम बडोनी
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माता: तारा देवी
- पत्नी का नाम विनय लक्ष्मी बडोनी
उनके पिता प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य थे और समाज सेवा के लिए जाने जाते थे। वर्ष 1919 में क्षेत्र में फैली हैजा (कोलेरा) महामारी के दौरान उन्होंने निस्वार्थ भाव से लोगों का उपचार किया, किंतु स्वयं भी इस बीमारी की चपेट में आ गए और मात्र 36 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उस समय श्रीदत्त केवल तीन वर्ष के थे।
प्रारंभिक शिक्षा
श्रीदत्त बडोनी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा चंबा क्षेत्र के विद्यालय से प्राप्त की। बाद में उन्होंने टिहरी मिडिल स्कूल से हिंदी मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे की शिक्षा के लिए वे देहरादून चले गए।
यहीं पर राष्ट्रीय आंदोलन, स्वतंत्रता की भावना तथा महात्मा गांधी के विचारों का उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा।
स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव
वर्ष 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान देहरादून में आयोजित आंदोलन में उन्होंने भाग लिया। उस समय उनकी आयु लगभग 14 वर्ष थी। आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया और लगभग दो सप्ताह जेल में रहना पड़ा।
यही घटना उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ बनी और उन्होंने आजीवन जनसेवा तथा स्वतंत्रता संघर्ष का मार्ग चुना।
शिक्षा, साहित्य और पत्रकारिता
अपनी पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने देहरादून के एक विद्यालय में अध्यापन कार्य भी किया। बाद में वे लाहौर, दिल्ली और इलाहाबाद जैसे शहरों में रहे।
इस दौरान उन्होंने विभिन्न शैक्षणिक परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं और हिंदी साहित्य का गंभीर अध्ययन किया।
वे पत्रकारिता से भी जुड़े तथा अनेक समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के संपादन में सहयोग दिया।
वर्ष 1937 में उनका पहला काव्य संग्रह “सुमन सौरभ” प्रकाशित हुआ। इसी काव्य संग्रह के बाद उन्होंने अपने नाम के साथ “सुमन” शब्द अपनाया और आगे चलकर वे श्रीदेव सुमन के नाम से प्रसिद्ध हुए। जबकी श्री देव सुमन का मूल नाम श्री दत्त बडोनी था i
राष्ट्रीय नेताओं से संपर्क
दिल्ली प्रवास के दौरान उनका परिचय अनेक राष्ट्रीय नेताओं और शिक्षाविदों से हुआ। बाद में वे वर्धा भी गए, जहाँ उन्हें महात्मा गांधी के विचारों को निकट से समझने का अवसर मिला।
गांधीजी के सत्य, अहिंसा और जनसेवा के सिद्धांतों ने उनके राजनीतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया।
1938 में श्री देव सुमन ने गढ़देश सेवा संघ का गठन किया, बाद में उसका नाम हिमालय सेवा संघ रखा गया था I
टिहरी रियासत के विरुद्ध संघर्ष
1930 के दशक के अंत तक श्रीदेव सुमन का ध्यान टिहरी रियासत की जनता की कठिन परिस्थितियों की ओर गया। उन्होंने महसूस किया कि वहाँ नागरिक अधिकार सीमित थे और जनता को अनेक प्रकार की प्रशासनिक बाधाओं का सामना करना पड़ता था।
इसी उद्देश्य से उन्होंने जनजागरण प्रारंभ किया और विभिन्न सामाजिक संगठनों के माध्यम से लोगों को संगठित करने लगे।
प्रजामंडल आंदोलन
वर्ष 1939 में टिहरी राज्य प्रजामंडल का गठन हुआ, जिसका उद्देश्य था—
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जनता के अधिकारों की रक्षा
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उत्तरदायी शासन की स्थापना
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सामाजिक एवं राजनीतिक जागरूकता का विस्तार
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शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक सुधारों की माँग
श्रीदेव सुमन इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल थे।
गिरफ्तारियाँ और संघर्ष
रियासत प्रशासन ने उनके आंदोलनों को रोकने के लिए अनेक प्रतिबंध लगाए।
उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया, नजरबंद किया गया तथा टिहरी रियासत से निर्वासित भी किया गया।
इसके बावजूद उन्होंने अपने आंदोलन को अहिंसात्मक ढंग से जारी रखा।
भारत छोड़ो आंदोलन के समय
वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी वे सक्रिय रहे।
इस अवधि में उन्हें देवप्रयाग से गिरफ्तार किया गया और विभिन्न जेलों में रखा गया।
लगभग पंद्रह महीनों तक कारावास के बाद उन्हें रिहा किया गया, लेकिन टिहरी रियासत में प्रवेश पर पुनः प्रतिबंध लगा दिया गया।
अंतिम गिरफ्तारी
प्रतिबंधों के बावजूद दिसंबर 1943 में वे टिहरी पहुँचे, जहाँ उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया।
जेल में उनके साथ कठोर व्यवहार किया गया। उन पर राजद्रोह सहित विभिन्न आरोप लगाए गए और उन्हें कारावास की सजा सुनाई गई।
उन्होंने अदालत में स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य हिंसा नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण और वैधानिक तरीकों से जनता के अधिकारों की रक्षा करना है।
ऐतिहासिक आमरण अनशन
जेल में लगातार हो रहे दुर्व्यवहार और अपनी मांगों की अनदेखी के विरोध में उन्होंने 3 मई 1944 से आमरण अनशन प्रारंभ किया।
उनकी प्रमुख माँगें थीं—
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प्रजामंडल को वैधानिक रूप से कार्य करने की अनुमति मिले।
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बंदियों को पत्राचार की सुविधा दी जाए।
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उनके विरुद्ध लगाए गए आरोपों पर निष्पक्ष सुनवाई हो।
जेल प्रशासन के लगातार दबाव के बावजूद उन्होंने अपना अनशन समाप्त नहीं किया।
शहादत
जेल में भी इन्होने आंदोलन को मरने नहीं दिया जेल से इन्होंने नारा दिया था -” तुम मुझे तोड़ सकते हो,मोड़ नहीं सकते ” इसके बाद यह अनशन में बैठ गए लगातार 84 दिनों तक चले अनशन के बाद 25 जुलाई 1944 को उन्होंने अंतिम सांस ली।
उनकी शहादत ने टिहरी रियासत में लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग को नई दिशा दी और जनता के आंदोलन को और अधिक मजबूत बनाया।
टिहरी रियासत का भारत में विलय
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, किंतु टिहरी रियासत तत्काल भारत में शामिल नहीं हुई।
लगातार जनआंदोलनों और लोकतांत्रिक दबाव के बाद अंततः 1 अगस्त 1949 को टिहरी रियासत का भारतीय संघ में विलय हुआ।
श्रीदेव सुमन का संघर्ष इस ऐतिहासिक परिवर्तन की प्रेरक शक्तियों में माना जाता है।
स्मृति और सम्मान
आज उत्तराखंड में श्रीदेव सुमन की स्मृति में अनेक संस्थानों, विद्यालयों और सार्वजनिक स्थलों का नामकरण किया गया है।
प्रत्येक वर्ष 25 जुलाई को “श्रीदेव सुमन बलिदान दिवस” मनाया जाता है तथा पूरे प्रदेश में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।
श्रीदेव सुमन के जीवन की प्रमुख तिथियाँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 25 मई 1916 | जौल गाँव में जन्म |
| 1919 | पिता वैद्य हरिराम बडोनी का निधन |
| 1930 | नमक सत्याग्रह में भाग, पहली गिरफ्तारी |
| 1937 |
सुमन सौरभ का प्रकाशन 1938 में गढ़देश सेवा संघ का गठन बाद ने उसका नाम हिमालय सेवा संघ रखा गया था |
| 1939 | टिहरी राज्य प्रजामंडल आंदोलन से सक्रिय जुड़ाव |
| 1942 | भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तारी |
| दिसंबर 1943 | अंतिम गिरफ्तारी |
| 3 मई 1944 | आमरण अनशन प्रारंभ |
| 25 जुलाई 1944 | 84 दिन के अनशन के बाद शहादत |
| 1 अगस्त 1949 | टिहरी रियासत का भारत में विलय |
निष्कर्ष
शहीद श्रीदेव सुमन का जीवन सत्य, अहिंसा, लोकतांत्रिक मूल्यों और जनसेवा के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरक उदाहरण है। उन्होंने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और अपने प्राणों का बलिदान दिया। उत्तराखंड के इतिहास में उनका योगदान सदैव सम्मान और प्रेरणा के साथ स्मरण किया जाता रहेगा।
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